यदि बहुदलीय संसदीय प्रजातंत्र का मतलब जनता को राजनीतिक चयन की स्वतंत्रता देना है, तो फिर भारत में इसके लिए ढेरों छोटी-बड़ी पार्टियां मौजूद हैं। लेकिन आर्थिक मोर्चे पर शायद ही किसी भी पार्टी के पास कोई नया विकल्प रह गया है। वस्तुत: आज राजनीतिक दलों के पास न तो कोई राजनीतिक एजेन्डा रह गया है, न ही आर्थिक। फिर भी भ्रमित पार्टियां ‘ आर्थिक वृध्दि’, ‘औद्योगिकीकरण’ और विकास के नारे लगा रही हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि अगर आर्थिक वृध्दि दर बढ़ाने के लिए एक निश्चित प्रकार के औद्योगिकीकरण की जरूरत हो, तो क्या इस औद्योगिकीकरण को विकास का पर्याय माना जा सकता है?
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